1073 करोड़ की परियोजना फाइलों में दबी, जर्जर वार्डों में इलाज को मजबूर बच्चे

1073 करोड़ की परियोजना फाइलों में दबी, जर्जर वार्डों में इलाज को मजबूर बच्चे

इंदौर – मध्य प्रदेश के इंदौर में बच्चों के स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रस्तावित 1073 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना वर्षों से फाइलों में अटकी हुई है। इसका खामियाजा मासूम मरीजों और उनके परिजनों को भुगतना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि सरकारी अस्पतालों के कई बाल रोग वार्ड जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं की भी कमी बनी हुई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के लिए अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं विकसित करने की योजना लंबे समय से लंबित है, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं और मंजूरियों में देरी के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही। दूसरी ओर अस्पतालों में मरीजों का दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे मौजूदा संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
जर्जर वार्डों में इलाज करा रहे बच्चों के परिजनों का कहना है कि कई जगह भवनों की स्थिति खराब है, पर्याप्त बेड नहीं हैं और आधुनिक उपकरणों की भी कमी महसूस की जा रही है। बारिश के मौसम में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है, जब भवनों की खराब हालत मरीजों और अस्पताल प्रबंधन दोनों के लिए परेशानी का कारण बनती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि 1073 करोड़ रुपये की प्रस्तावित परियोजना समय पर धरातल पर उतरती है, तो इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे मालवा-निमाड़ क्षेत्र के बच्चों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकती हैं। इससे गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बड़े शहरों पर निर्भरता भी कम होगी।
अब सवाल यह है कि बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी इतनी महत्वपूर्ण परियोजना आखिर कब तक सरकारी फाइलों में दबी रहेगी। आम लोगों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मांग है कि सरकार और संबंधित विभाग इस परियोजना को प्राथमिकता देते हुए जल्द मंजूरी और क्रियान्वयन सुनिश्चित करें, ताकि बच्चों को सुरक्षित और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।

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